Mujhe bhatakne do

कल का कलंक
आज का चिंतन
कल का स्वपन
मैं था,
मैं हूँ .

क्यों विरोध करती हो
मेरे बावलेपन का
अबोध नहीं मेरी सोच
सरल है -

इच्छाओं से त्रसित
वासना से सिंचित
धरती-सी
अभी सूखी है,

पर कुछ समय दो
इस तृष्णा की तृप्ति के उपरांत
पुष्प और कनक भी उपजेगी

बांधना चाहती हो जिसको तुम
उसी नियत,
नियति को
कुछ ढील दो,
आकाश में उड़ते सभी पाखियों को
यह पतंगा चूमना चाहता है
कुछ ढील दो
क्यों सोचती हो कि क्षितिज लाँघ कर
मैं हवा हो जाऊंगा?

हर एक भ्रमनकारी भ्रमित नहीं होता
बहता है जब तक,
निश्चल रहता है जल,
साँस चलती रहती नहीं एक नियम में
जब मचलती है, जब गरजती है
तो ही हो सुर बनती है,
गीत बनती है

और बनती है क्रांति का आह्वान भी

मुझे मेरी राह से भटकने दो

क्या रखा है यूं भी हमारे समाज की
भ्रष्ट, भीरु, रूढ़िवादी रस्मों में
और यदि यथार्थ की कसौटी पर
यही परिपक्व, यही उत्कृष्ट सिद्ध हुई
तो मैं भी इनको अपना लूँगा

सम्भव है कि संसार में, हर युग में
नई परिभाषाएं बनती है
और पुरानी मटकियाँ टूटती हैं
तो प्यास नई नलकियों से बुझती हैं
मैं हूँ अभी संसार की उलझनों से मुक्त
मुझे भविष्य की फुटकार दे दे कर
मेरे वर्तमान में क्यों कुष्टा भरती हो
सम्भव है कि इस रोक टोक से
मैं पिंजरे-का शेर हट्टाकट्टा हो कर भी
भयभीत भीरु शिशु ही बना रह जाऊंगा

मुझे सीख दो, संभावना की चेतना दो
मेरे संस्कारों की दृढ़ता पर विश्वास करो
हर चोट से निखारुंगा मैं
विफलता अपराध नहीं होती
श्रापों और वनवासों के परिबल से
राम कृष्ण पांडव करण परुशराम अवतार तक
अपने जनम का पुरुषार्थ कर पाये

योगी वह नहीं जो गुफा में
सब साधन सब सुख संग रहता है
योगी वह है जो जीवन क्रय में
विलीन हो कर
धरम करम का प्रतिनिधि होता है.

(सर्व मंगल हो)
विवेक शर्मा