देखता हूठआइना जब à¤à¥€,
कोई चेहरा नज़र नहीं आता
कोई पहचानता नहीं आजकल मà¥à¤à¤•ो,
कोई मà¥à¤à¤¸à¤¾ नज़र नहीं आता
गà¥à¤®à¤¨à¤¾à¤® नहीं होना था मà¥à¤à¥‡
और न ही अतीत में समाना था
पर खोजता हूठतो आजकल में
मेरा वजूद नज़र नहीं आता
पà¥à¤°à¥€à¤¤ की पहली नज़म मेरी लिखी हà¥à¤ˆ
अब मूरखों ने अपना ली है
आशिकी के नाम पर हर जाहिल ने
कलम पर सà¥à¤¯à¤¾à¤¹à¥€ चड़ा ली है
तà¥à¤•बंदी हर पनवाड़ी के यहाठबिकती है
हर हलवाई ने शायरों सी दाà¥à¥€ बड़ा ली है
न अब वो गीत है, न ग़ज़लों का ज़माना है
न हà¥à¤¸à¥à¤¨ में वो नजाकत है, न अब वैसा कोई दीवाना है
कौन पूछता है ग़ालिब तà¥à¤à¤•ो, मीर कौन है, कà¥à¤¯à¤¾ पता?
बचà¥à¤šà¤¨ तेरी मधà¥à¤¶à¤¾à¤²à¤¾ अब कहाठनदारद है?
अब कहाठहै वो धरम करम की बातों का मोल?
दिनकर तेरी रशà¥à¤®à¤¿à¤°à¤¥à¥€ का कृशà¥à¤£ और करण कहाà¤?
कà¥à¤°à¤¾à¤¨ पà¥à¤°à¤¾à¤¨ निज à¤à¤¾à¤·à¤¾ अब जाहिल ढूंडा करते है
वो ज़माना जब पंडित विदà¥à¤µà¤¾à¤¨ सलाह दिया करते थे
है गà¥à¤œà¤° गया, बंट गया अब मिथà¥à¤¯à¤¾ और साहितà¥à¤¯ में
अब तो पहलवान पंच, और गà¥à¤‚डे शिकà¥à¤·à¤¾ मंतà¥à¤°à¥€ बनते है
गà¥à¤¯à¤¾à¤¨à¥€ हà¥à¤† तो कà¥à¤¯à¤¾ किया, à¤à¥‚खा सà¥à¤•ूल टीचर बना
शासà¥à¤¤à¥à¤° जाने तो घर घर पहà¥à¤à¤šà¤¾ मंतà¥à¤° पॠपॠगà¥à¤°à¤¹à¤¶à¤¾à¤‚ति करने
आà¤à¤¤à¥‡à¤‚ आई, तो आलिफ बे ते मà¥à¥žà¥à¤¤ में पढा कर
मà¥à¤«à¥à¤¤à¥€ की मोटी जेब में जेवर à¤à¤° दिà¤
या फ़िर बैठा है पराये देश में, खोजता तथà¥à¤¯
या अंजानो के मधà¥à¤¯ अपनापन, अपना परिचय?
या दो शबà¥à¤¦ जो वहम ही दे देंगे पà¥à¤°à¤—ति का
या वो नाम, वो शोहरत जिसके दम पर
किसी रोज़ चंद लोग तà¥à¤à¥‡ याद करेंगे
कैसा विवेक है तेरा यह दोसà¥à¤¤ जो माया में फंसा
तलाश रहा है मिटà¥à¤Ÿà¥€ का तन, मिटà¥à¤Ÿà¥€ सा धन,
रà¥à¤• थम सोच धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ लगा, तà¥à¤à¤•ो कà¥à¤¯à¤¾ à¤à¤¯ है
आदी-अंत, शानà¥à¤¤à¤¿ -समà¥à¤ªà¤¤à¤¿, गति-अगति, अतीत-à¤à¤µà¤¿à¤·à¥à¤¯
सब वहम है, तेरा सà¥à¤µà¤ªà¤¨ है,
है पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¬à¤¿à¤®à¥à¤¬ तेरा धूमिल ही नहीं
धूल धà¥à¤†à¤‚ तेरा सरà¥à¤µà¤¸à¥à¤µ है.
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